Thursday, May 7, 2015

क्षपित, त्रुटि, विकीर्ण



मित्रो पिछली पोस्ट पर पहले ३ निम्नलिखित शब्द मिले, अब इन पर आप अपने भाव लिखिए 
क्षपित
त्रुटि 
विकीर्ण


******************
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
'त्रुटि' न जाने हमसे कहाँ हुई, भाव जो यूं 'क्षपित' हुए
'विकीर्ण' सा अंतर्मन 'प्रतिबिंब', मन में एक भय लिए

नैनी ग्रोवर 
क्षपित हुई जब जब नारी, विकीर्ण तब तब पाप हुआ, 
ऐसी भी क्या त्रुटि हुई प्रभु, 
क्यों ना मानव को संताप हुआ ...!!

अलका गुप्ता 
कुछ तो त्रुटि-मय आव्हान हुए | 
प्रलोभन मय.....संवाहन हुए | 
क्षपित हुए रूप प्रतिरूप सभी...
विकीर्ण आश किरण से भान हुए || 

विभिन्न संदर्भो में बोए गए |
बीज निरंतर निद्रा मय सोए | 
भानु पवन जल स्पर्शों ने... 
अंकुरण अकुलाहट उपजाए ||

अंतर्मन पोषित आग़ाज हुए |
शीश उठा..गहन मंतव्य..गहे |
ललकार लहे भीषण संवाद बहे 
तरु ताड़ ..शज़र विकराल भए ||


प्रभा मित्तल 
भोला था बचपन भूल गया मन
उसके मानसरोवर में कितनी इच्छाएँ
पलती थीं कितनी हुईं पूरी कुछ अधूरी
'क्षपित' शापित सी तड़पती थीं।
ना जाने किस 'त्रुटि' की सजा मिली
जीवन के इस 'विकीर्ण' मरुस्थल में
गति हीन हो रुकूँ नहीं ,बढ़ती जाऊँ
इसी चाह में राह के कंटक चुनती थी। 

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Wednesday, March 11, 2015

प्रकृति, जीवन, प्रेम


प्रकृति
जीवन
प्रेम


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ...
'प्रकृति' से 'प्रेम' और प्रेम में हो विश्वास
'प्रतिबिम्ब' के 'जीवन' में, आप हो ख़ास


नैनी ग्रोवर 
'प्रक्रति' बिन 'जीवन' नहीं, और जीवन बिन 'प्रेम',
ये ना हो तो यूँ लगता है, ज्यूँ तस्वीर बिन फ्रेम


दीपक अरोड़ा
'प्रकृति' से जीवन
'जीवन' 'प्रेम' बिन अधूरा
तीनों के संगम से
ये सांसारिक चक्र हो पूरा-


DrShyam Sundar Matia 
जो लोग 'प्रकृति' से 'प्रेम' करते हैं , उनका 'जीवन' सुखी रहता है /


कुसुम शर्मा 
खिल उठता है मन
देख छँटा 'प्रकृति' की
'प्रेम' भी जब छू लेता है
तन को नही मन को
लगता है इंद्रधनुषी रंग
फैल गए हो 'जीवन' में


प्रभा मित्तल
 'प्रकृति' ने हमें जन्म दिया,'जीवन' दिया
है यह ईश्वर का मानव के लिए वरदान
इसे प्रदूषित ना करें,वृक्ष लगाएं वन बचाएं
और सहेजें 'प्रेम' से ,सदा रखें यह ध्यान।

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Friday, March 6, 2015

फागुन, रंग, होली


( फागुन, रंग, होली शब्दों पर भाव )

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
फागुन’ के ‘रंग’ में रंगा, मेरे इर्द गिर्द सारा संसार
होली’ आई ‘प्रतिि्बिंब’, आओ भर ले प्यार बेशुमार


डॉली अग्रवाल 
'फागुन ' क्या आया ,खिल उठा मन मयूर
'होली' आई तो प्यार के रंग से खुद को सजा लिया ---


दिनकर बडथ्वाल 
आया फागुन लेकर होली के रंग 
है वक्त मौज मस्ती का दोस्तों के संग


प्रभा मित्तल 
रंग-रंग के 'रंग' लेकर
आई 'होली''फागुन'में
मन मगन हुआ
मन मस्त हुआ
रंग-रंगीले फागुन में
ऊँच-नीच का भेद मिटा लें
मन से मन का मेल करा लें
चल खेलें होली फागुन में।


कुसुम शर्मा 
फागुन में होली की देखो बहार
साजन भी खेले है सजनी के साथ
रंग छाए, छाये जैसे बरखा बहार
झूम झूम नाचे है एक दूसरे के साथ



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Tuesday, March 3, 2015

घाव, घायल, घातक



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
शब्दों का 'घाव' 'घातक' होता है जो मन को 'घायल' करता है
मधुर भाषा का प्रयोग 'प्रतिबिम्ब', रिश्तो को प्रबल करता है

पुष्कर बिष्ट 
जाने कब तक घाव भरेंगे इस घायल मानवता के?
जाने कब तक सच्चे होंगे सपने सब की समता के?
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है..

नैनी ग्रोवर ---
बड़ा घातक है घाव धोखे का, इंसान को पागल करता है,
नज़र आये या ना, ये वार दिलों को घायल करता है..!! न

DrShyam Sundar Matia 
मोहब्बत के घाव ,
इश्क के घातक को इतना घायल
कर जाते हैं कि जीवन भर उन की
टीस महसूस होती रहती हैं //


किरण आर्य 
घायल मन की पीर
जब हो जाती तब्दील घाव में
तब रिसने लगती यादों की पीब
तब रुदन रूह का कर लेता
घातक रूप ग्रहण
हर तरफ मचता हाहाकार
और यहीं से होता है आरम्भ
आत्मा के पतन का..

डॉली अग्रवाल 

उफ़्फ़ ये घाव दिल के
घायल हैं ये जिस्मो जान
घातक बनने बेठे इस दुनिया के इंसान ! !


अलका गुप्ता 

घात ये इन्सानियत के कातिल की |
रिसते रहंगे घाव घातक घायल की |
दहलें दिल दहशते दारुण आघात से..
धर्म है पीना लहू लाल-लाल लालों के ||





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Saturday, December 6, 2014

प्रतियोगिता शुरुआत


{ रात-अमीर-उजियारा.के विलोम शब्दों का प्रयोग करते हुए भाव }


दीपक अरोड़ा 
रात-अमीर-उजियारा.... दिन-गरीब-अंधेरा

हर रात अंधेरे में गुजारता वह गरीब
दिन में दो रोटी के लिए फिरे मारा-मारा
अमीर तो ऐश करे गरीब का खून चूस कर
गरीब के जीवन में कहां से आए उजियारा



उषा रतूड़ी शर्मा ''
एक गरीब सुबह केे उजाले में यूँ भटका
मानो रात का घना अँधियारा सिमटा हो.. उषा


नैनी ग्रोवर 
इक गरीब के लिए, दिन है क्या, और रात क्या,
बच्चों की खातिर झूझना है, अन्धेरा क्या, बरसात क्या ..!!


कुसुम शर्मा 
आज दिन के उजाले में भी अँधेरा है
चारो और फैला भ्रस्ताचार का मेला है
हर मौसम पतझड़ हर इंसान कमीना है
पीने के लिया पानी नहीं पसीना है
यहाँ दो वक़्त की रोटी नहीं
गरीब रोज खाता गम का निवाला है
नेता मूर्तियों को सवारने में लाखो लगा देते है
वही गरीब एक वक़्त की रोटी के लिए जान गवा देते है

DrShyam Sundar Matia 
दिन के उजियारे की थकान के पश्चात , रात का
हल्का हल्का अँधेरा , गरीब के लिए चैन की नींद प्रदान करता है /

अलका गुप्ता  { विजेता  - बधाई  }
रात-अमीर-उजियारा. (१) दिन..(2) गरीब (३) अँधेरा

रात-दिन...मशक्कत से..जिया |
अंधेरों से लड़ा गर्दिशों को पिया |
हम रहें ..उजालों में ..गरीब था..
वह जला.. बन...बाती का दिया ||


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ....
'दिन' के उजाले में 'गरीब' पसीना बहाता है
'अँधेरा' उसको रोज भूख बन कर डसता है


प्रभा मित्तल 
रोजी की तलाश में निकला , लौटकर न आया
'दिन' भर भटकता रहा 'ग़रीब' दो जून रोटी पाने को
उधर दिया भी राह देखता जूझता रहा रात भर
तूफान से,उसके घर का 'अंधियारा' मिटाने को।



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Sunday, January 26, 2014

तंत्र - मंत्र - यंत्र



तंत्र  - मंत्र  - यंत्र  शब्दो के साथ मित्रो के भाव

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  
देश में राजनीति जहर घोल रही
बदले व्यवस्था क्या है इसका मंत्र
'प्रतिबिंब' काश मिल जाए येसा यंत्र
सुधर जाए समाज और ये भ्रष्ट तंत्र

अलका गुप्ता 
प्रजा-तंत्र है ..जनता का जनता पर शाशन |
भूल बैठा सब.. नेता बन..जमा कर आसन |
गडबड घोटालों के गढ़ लिए.. मनमाने यंत्र ..
फूंकके मंत्र तमाम...बना भ्रष्टाचारी प्रशाशन ||

दिनकर बडथ्वाल 
झूठ है की यहाँ कोई प्रजा -तंत्र है
प्रजा को छलने का ये एक मंत्र है

सच पूछो तो ये स्वार्थियों का जाल-तंत्र है
इससे पार पाने का ना ही कोई यंत्र है


DrShyam Sundar Matia 
तंत्र और मंत्र के लिय किसी यंत्र की आवश्यकता नहीं होती /

किरण आर्य 
कैसा है ये
झोल झाल
के सब गाये
कुतंत्र के मंत्र
भ्रष्टाचार के यंत्र 
बन चलाये
शासन तंत्र



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Saturday, July 27, 2013

कल्याण, संस्कार, दान

[मेरे द्वारा दिए गए तीन शब्द - "कल्याण, संस्कार, दान" पर मित्रो के भाव ]


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
कल्याण हो समस्त मानव जाति का, दान - धर्म का भाव बना रहे 
संस्कार एवं संस्कृति का बोध रहे 'प्रतिबिम्ब', कर्म से प्रेम बना रहे


Shyam Sundar Matia 
आज के नेताओं के ऐसे संस्कार हैं दान में भी अपना कल्याण की सोचते हैं /


भरत शर्मा 
मानव कल्याण का मूल मंत्र . . ,
हो सब मे सद्भाव
दान - धर्म का नेक
यह संस्कार अपनाने
के हित ... कदम उठे अनेक ... !!


Pushpa Tripathi 
हम भारत के वंशज 
हम भारतवासी है 
भारत भूमि देवभूमि 
कण कण माती कहती है ......
संस्कार यहाँ रगों में दौड़ता 
दान भी अभिलाषी है 
कर्ण का दान , हरिश्चन्द्र महादानी 
राजा बली द्वारा बटुक को तीन पग भूमि प्रदान 
एकलव्य का अंगूठा दान 
पतित पावन सीता राम 
कृष्ण की भूमि ... कबीर की नगरी 
कितने ही कल्याण ... कितने ही वरदान 
ये भारत पावन भूमि है 
शत शत बलिहारी प्राण मै जाऊं 
ये भूमि हमारी जननी है 


पुष्कर बिष्ट 
दया, दान, कल्याण,सेवा, प्रेम, अहिंसा, सत्यनिष्ठता से पूर्वजों की भावना में श्रद्धा, विश्वाश की आस्था को बनाये रखना हीं हमारा संस्कार है !


अलका गुप्ता
होंगे सु-संस्कार होगा कल्याण तभी |
दया दान सत्य होगा निस्वार्थ जभी |
करुणा प्रेम अहिंसा का समावेश रहे ..
मानव में मानवता का हो प्रवास तभी ||

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