Friday, June 19, 2015

रेखाकिंत - संघर्ष - शंकित





  • प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ......
    'रेखाकिंत' है अगर नियति, 'संघर्ष' की राह मुमकिन है
    'शंकित' न हो 'प्रतिबिम्ब', कर्म की राह होती फलित है




  •  रेखांकित है हाथो की रेखा 
  • जाने इन मे कितना संघर्ष छुपा 
  • शंकित नही की वह पार न कर पाये 
  • ये तो है हमारे कर्मों से बँधा !

  • अलका गुप्ता ~~~~~~~~~~~
    न ठहरें कभी उस मंजिल ठिए आदम |
    रेखांकित ..राह में ...बढते रहें कदम | 

    होना क्यूँ आत्मबल पर शंकित कभी ..
    छोड़ ना देवें.. हरगिज संघर्ष का दम ||


यहाँ प्रस्तुत सभी शब्द और भाव पूर्व में प्रकाशित है समूह " 3 पत्ती - तीन शब्दों का अनूठा खेल" में https://www.facebook.com/groups/tiinpatti/

Monday, June 1, 2015

विज्ञान /प्रकृति से सम्बन्धित ३ शब्द


मित्रो आज आप ३ ऐसे शब्द चुनिए अपने लिए जिनका सीधा संबंध विज्ञान /प्रकृति से हो, साथ ही भाव लिखिए और उन शब्दों को सम्मिलित कीजिये




    • रिश्तो में 'भौतिक' रूप से जुड़ना जरुरी है, जिसमे 'रसायन' प्रेम का होना जरुरी है

      प्रकृति का आधार भी तो प्रेम है 'प्रतिबिम्ब', जिसमे पर्यावरण का सरंक्ष्ण जरुरी है

    • कुसुम शर्मा आकाश, जमी ,नीर
      न बरसता आकाश से नीर 
      तो जमी प्यासी की प्यासी रह जाती 

      बरसा जो नीर तो लगा कि उसकी प्यास बुझी ........

    • प्रभा मित्तल संगणक,अंतरजाल,दूरभाष।
      ---------------------------
      'संगणक' जब से आया है 

      कागज़ - कलम छूट गया
      किताबों से मन रूठ गया
      'अंतरजाल' और 'दूरभाष' ही 
      बन गये हैं जीवन का आधार
      इस मशीनीकरण के युग में अब लगता है
      विज्ञान बिना मानव जीवन हो जैसे निस्सार।

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Thursday, May 7, 2015

क्षपित, त्रुटि, विकीर्ण



मित्रो पिछली पोस्ट पर पहले ३ निम्नलिखित शब्द मिले, अब इन पर आप अपने भाव लिखिए 
क्षपित
त्रुटि 
विकीर्ण


******************
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
'त्रुटि' न जाने हमसे कहाँ हुई, भाव जो यूं 'क्षपित' हुए
'विकीर्ण' सा अंतर्मन 'प्रतिबिंब', मन में एक भय लिए

नैनी ग्रोवर 
क्षपित हुई जब जब नारी, विकीर्ण तब तब पाप हुआ, 
ऐसी भी क्या त्रुटि हुई प्रभु, 
क्यों ना मानव को संताप हुआ ...!!

अलका गुप्ता 
कुछ तो त्रुटि-मय आव्हान हुए | 
प्रलोभन मय.....संवाहन हुए | 
क्षपित हुए रूप प्रतिरूप सभी...
विकीर्ण आश किरण से भान हुए || 

विभिन्न संदर्भो में बोए गए |
बीज निरंतर निद्रा मय सोए | 
भानु पवन जल स्पर्शों ने... 
अंकुरण अकुलाहट उपजाए ||

अंतर्मन पोषित आग़ाज हुए |
शीश उठा..गहन मंतव्य..गहे |
ललकार लहे भीषण संवाद बहे 
तरु ताड़ ..शज़र विकराल भए ||


प्रभा मित्तल 
भोला था बचपन भूल गया मन
उसके मानसरोवर में कितनी इच्छाएँ
पलती थीं कितनी हुईं पूरी कुछ अधूरी
'क्षपित' शापित सी तड़पती थीं।
ना जाने किस 'त्रुटि' की सजा मिली
जीवन के इस 'विकीर्ण' मरुस्थल में
गति हीन हो रुकूँ नहीं ,बढ़ती जाऊँ
इसी चाह में राह के कंटक चुनती थी। 

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Wednesday, March 11, 2015

प्रकृति, जीवन, प्रेम


प्रकृति
जीवन
प्रेम


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ...
'प्रकृति' से 'प्रेम' और प्रेम में हो विश्वास
'प्रतिबिम्ब' के 'जीवन' में, आप हो ख़ास


नैनी ग्रोवर 
'प्रक्रति' बिन 'जीवन' नहीं, और जीवन बिन 'प्रेम',
ये ना हो तो यूँ लगता है, ज्यूँ तस्वीर बिन फ्रेम


दीपक अरोड़ा
'प्रकृति' से जीवन
'जीवन' 'प्रेम' बिन अधूरा
तीनों के संगम से
ये सांसारिक चक्र हो पूरा-


DrShyam Sundar Matia 
जो लोग 'प्रकृति' से 'प्रेम' करते हैं , उनका 'जीवन' सुखी रहता है /


कुसुम शर्मा 
खिल उठता है मन
देख छँटा 'प्रकृति' की
'प्रेम' भी जब छू लेता है
तन को नही मन को
लगता है इंद्रधनुषी रंग
फैल गए हो 'जीवन' में


प्रभा मित्तल
 'प्रकृति' ने हमें जन्म दिया,'जीवन' दिया
है यह ईश्वर का मानव के लिए वरदान
इसे प्रदूषित ना करें,वृक्ष लगाएं वन बचाएं
और सहेजें 'प्रेम' से ,सदा रखें यह ध्यान।

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Friday, March 6, 2015

फागुन, रंग, होली


( फागुन, रंग, होली शब्दों पर भाव )

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
फागुन’ के ‘रंग’ में रंगा, मेरे इर्द गिर्द सारा संसार
होली’ आई ‘प्रतिि्बिंब’, आओ भर ले प्यार बेशुमार


डॉली अग्रवाल 
'फागुन ' क्या आया ,खिल उठा मन मयूर
'होली' आई तो प्यार के रंग से खुद को सजा लिया ---


दिनकर बडथ्वाल 
आया फागुन लेकर होली के रंग 
है वक्त मौज मस्ती का दोस्तों के संग


प्रभा मित्तल 
रंग-रंग के 'रंग' लेकर
आई 'होली''फागुन'में
मन मगन हुआ
मन मस्त हुआ
रंग-रंगीले फागुन में
ऊँच-नीच का भेद मिटा लें
मन से मन का मेल करा लें
चल खेलें होली फागुन में।


कुसुम शर्मा 
फागुन में होली की देखो बहार
साजन भी खेले है सजनी के साथ
रंग छाए, छाये जैसे बरखा बहार
झूम झूम नाचे है एक दूसरे के साथ



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Tuesday, March 3, 2015

घाव, घायल, घातक



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
शब्दों का 'घाव' 'घातक' होता है जो मन को 'घायल' करता है
मधुर भाषा का प्रयोग 'प्रतिबिम्ब', रिश्तो को प्रबल करता है

पुष्कर बिष्ट 
जाने कब तक घाव भरेंगे इस घायल मानवता के?
जाने कब तक सच्चे होंगे सपने सब की समता के?
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है..

नैनी ग्रोवर ---
बड़ा घातक है घाव धोखे का, इंसान को पागल करता है,
नज़र आये या ना, ये वार दिलों को घायल करता है..!! न

DrShyam Sundar Matia 
मोहब्बत के घाव ,
इश्क के घातक को इतना घायल
कर जाते हैं कि जीवन भर उन की
टीस महसूस होती रहती हैं //


किरण आर्य 
घायल मन की पीर
जब हो जाती तब्दील घाव में
तब रिसने लगती यादों की पीब
तब रुदन रूह का कर लेता
घातक रूप ग्रहण
हर तरफ मचता हाहाकार
और यहीं से होता है आरम्भ
आत्मा के पतन का..

डॉली अग्रवाल 

उफ़्फ़ ये घाव दिल के
घायल हैं ये जिस्मो जान
घातक बनने बेठे इस दुनिया के इंसान ! !


अलका गुप्ता 

घात ये इन्सानियत के कातिल की |
रिसते रहंगे घाव घातक घायल की |
दहलें दिल दहशते दारुण आघात से..
धर्म है पीना लहू लाल-लाल लालों के ||





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Saturday, December 6, 2014

प्रतियोगिता शुरुआत


{ रात-अमीर-उजियारा.के विलोम शब्दों का प्रयोग करते हुए भाव }


दीपक अरोड़ा 
रात-अमीर-उजियारा.... दिन-गरीब-अंधेरा

हर रात अंधेरे में गुजारता वह गरीब
दिन में दो रोटी के लिए फिरे मारा-मारा
अमीर तो ऐश करे गरीब का खून चूस कर
गरीब के जीवन में कहां से आए उजियारा



उषा रतूड़ी शर्मा ''
एक गरीब सुबह केे उजाले में यूँ भटका
मानो रात का घना अँधियारा सिमटा हो.. उषा


नैनी ग्रोवर 
इक गरीब के लिए, दिन है क्या, और रात क्या,
बच्चों की खातिर झूझना है, अन्धेरा क्या, बरसात क्या ..!!


कुसुम शर्मा 
आज दिन के उजाले में भी अँधेरा है
चारो और फैला भ्रस्ताचार का मेला है
हर मौसम पतझड़ हर इंसान कमीना है
पीने के लिया पानी नहीं पसीना है
यहाँ दो वक़्त की रोटी नहीं
गरीब रोज खाता गम का निवाला है
नेता मूर्तियों को सवारने में लाखो लगा देते है
वही गरीब एक वक़्त की रोटी के लिए जान गवा देते है

DrShyam Sundar Matia 
दिन के उजियारे की थकान के पश्चात , रात का
हल्का हल्का अँधेरा , गरीब के लिए चैन की नींद प्रदान करता है /

अलका गुप्ता  { विजेता  - बधाई  }
रात-अमीर-उजियारा. (१) दिन..(2) गरीब (३) अँधेरा

रात-दिन...मशक्कत से..जिया |
अंधेरों से लड़ा गर्दिशों को पिया |
हम रहें ..उजालों में ..गरीब था..
वह जला.. बन...बाती का दिया ||


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ....
'दिन' के उजाले में 'गरीब' पसीना बहाता है
'अँधेरा' उसको रोज भूख बन कर डसता है


प्रभा मित्तल 
रोजी की तलाश में निकला , लौटकर न आया
'दिन' भर भटकता रहा 'ग़रीब' दो जून रोटी पाने को
उधर दिया भी राह देखता जूझता रहा रात भर
तूफान से,उसके घर का 'अंधियारा' मिटाने को।



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